अंतरराष्ट्रीय बाजार में छिंदवाड़ा की नई पहचान ।मक्का उत्पादन को आर्थिक उद्यमिता से जोड़ने की दृष्टि -भूपेन्द्र गुप्ता
December 14, 2019 • M.S.Bishotiya 9425734503

देश की कार्नसिटी में मक्का महोत्सव

 

 


भोपाल।फसलों के उत्पादन का उत्सव मनाने की परंपरा को अब औद्योगिक आधार मिल रहा है । फसलों की ब्रांडिंग से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी किसानों को ज्यादा दाम मिलने की संभावनाएं बनी है। 
भारत का कृषि जलवायु क्षेत्र इतना विविधता पूर्ण है कि यहां हर क्षेत्र एक विशिष्ट फसल के नाम से जाना पहचाना जाता है। अकेले मध्य प्रदेश में 11 कृषि जलवायु क्षेत्र है यहां की मिट्टी और जलवायु में भिन्नता है जो अलग-अलग फसलों के लिए उपयुक्त है । मालवा के आलू टीकमगढ़ का अदरक, बड़वानी की मिर्ची मंदसौर का लहसुन और सीहोर विदिशा क्षेत्र का गेहूं शरबती गेहूं , बालाघाट सिवनी के कालीमूछ के चावल और अब इस श्रेणी में छिंदवाड़ा का मक्का आ गया है।
मक्का उत्पादन को औद्योगिक गतिविधि से जोड़ने के लिए की गई पहल से मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ ने मक्का उत्पादन को व्यावसायिक गतिविधि से जोड़ने की पहल करते हुए कमलनाथ कमलनाथ ने कॉर्न फेस्टिवल 2019 को नया स्वरूप देने की कोशिश की है। कॉर्न फेस्टिवल यानी मक्का महोत्सव के माध्यम से किसानों के लिए उनके विकास के लिए एक नया रास्ता खोल जा रहा है। इससे वे तरक्की और खुशहाली की बुनियाद खुद रख सकें। 

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 15-16 दिसंबर को मनाया जाने वाला कॉर्न फेस्टिवल यह महोत्सव मध्य प्रदेश के किसानों के लिए  एक नया अध्याय सिद्ध होगा जहां से तरक्की और खुशहाली उनके दरवाजे पहुंचेगी ।सभी जानते हैं कि मध्य प्रदेश 70% आबादी कृषि कार्यों पर निर्भर है हमारी विभिन्न फसलें मध्यप्रदेश की पहचान को स्थापित  करती हैं किंतु कृषि के क्षेत्र में उसे प्रभावी बनाए जाने के प्रयत्न अब तक नहीं हुए थे यह दिखायी  देता है ।कॉर्न फेस्टिवल के माध्यम से अब पता चलेगा कि मक्का के पास कितना बड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार है । वह  केवल पॉपकॉर्न या कार्न फ्लेक्स तक सीमित नहीं है न ही उसका बाजार  दो चार तरह के व्यंजन या स्वीटकार्न सूप तक सीमित है।उससे लगभग सौ तरह के व्यंजन,टोस्ट बिस्किट ,कुकीजआदि  बनाये जा सकते हैं। जिनके लिये आवश्यक मशीन और तकनीकि का प्रदर्शन छिंदवाड़ा में किया जा रहा है।
लोगों के मन में एक स्वाभाविक सवाल उठ सकता है कि इस महोत्सव के लिये छिंदवाड़ा ही क्यों चुना गया ?उत्तर है क्योंकि छिंदवाड़ा ही देश में सबसे ज्यादा मक्का पैदा करने वाला जिला है ।देश के कुल मक्का उत्पादन में अकेले मध्यप्रदेश का 14%योगदान है और इसमें अकेले छिंदवाड़ा का योगदान ही 13% है । इसीलिये इसे कार्न सिटी के रूप में लोकप्रिय करने की योजना बनी ताकि मक्का के विश्व बाजार के मानचित्र पर छिंदवाड़ा अपनी पहचान छोड़ सके।
कमलनाथ  ने इंदौर में मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश के दौरान इस बात को बार-बार दोहराया था कि मध्य प्रदेश की फसलों को आधार  बनाकर फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री विकसित करके  ही किसान के दरवाजे पर तरक्की पहुंचाई जा सकती है कार्न फेस्टिवल इसका एक कदम है ।
मध्यप्रदेश में आलू बहुतायत में होता है टीकमगढ़ का अदरक भी पूरे देश में अपनी पहचान बनाए हुए है ।मंदसौर का लहसुन,मांडू का सीताफल, बड़वानी की मिर्ची ,निमाण का कपास,गुना का धनिया, जबलपुर की मटर ,होशंगाबाद का अमरूद,ऐसी कई फसलें हैं जिनका एक अंतरराष्ट्रीय बाजार विकसित किया जा सकता है ।सवाल है कि किस तरह किसान के दरवाजे पर नई तकनीकी  और कौशल  पहुंचे । कॉर्न फेस्टिवल ऐसी ही एक पहल है जिसके माध्यम से किसानों के दरवाजे पर नई नई मशीनें  नया-नया ज्ञान पहुंचेगा  । उन्हें पता चलेगा की पूरी दुनिया मक्के के बाजार के लिए आतुर है । मक्का में उपलब्ध पौष्टिक तत्व ही मक्का की खूबी है इसमें पाया जाने वाला फाइबर पेट को कई बीमारियों से बचा कर रखता है और इसके पौष्टिक गुणों के कारण पूरी दुनिया में इसकी मांग है । जिस तरह से दुनिया में पोल्ट्री उद्योग विस्तार पा रहा है उसमें पोल्ट्री फीड के रूप में मक्का ही प्रमुख खाद्यान्न है इसलिए मक्का के किसानों को अगर पोल्ट्री फीड बनाने की विधि और कुशलता प्रदान की जाती है तो छिंदवाड़ा एवं अन्य क्षेत्रों का मक्का उत्पादक  किसान दुनिया से टक्कर ले सकेगा।
मुख्यमंत्री का यह विजन प्रथम दृष्टि में ही सफल होता दिखाई पड़ रहा है कई आदिवासी महिलायें तामिया जैसी जगह में इसके उत्पादन से जुड़ गईं हैं।वे मक्का की कुकीज तक बना रहीं हैं।
कल को मालवा में पोटेटो फेस्टिवल,मंदसौर में गार्लिक फेस्टिबल और टीकमगढ़ में जिंजर फेस्टिवल भी सामने आ सकेंगे।पहली बार देश के ख्यातनाम कृषि वैग्यानिक आज छिंदवाड़ा में इकट्ठे हो रहे हैं।कल इसी तरह दूसरी जगह आकर दूसरी चीजें पैदा करने वाले किसानों को भी नयी तकनीकी सिखायेंगे ।कमलनाथ सरकार की इस पहल से हार्टीकल्चर गतिविधियां बढ़ीं हैं ।फूल की खेती से आगे अब सब्जियों के उत्पादन में किसान आगे आ रहे हैं ।इस जागरूकता से इन क्षेत्रीय विशिष्ट फसलों के "जी आई टेग" का रास्ता भी प्रशस्त हुआ है ।
सरकार ने परंपरागत रूप से खेती करने वाले किसानों को महज उन्नत किसानों के खेत  दिखाये जाने के रस्मी कार्यक्रमों को अब उत्सव में बदल दिया है जहां किसान केवल फसल नहीं बल्कि उस फसल से आगे बनने वाले उत्पाद,उसमें उपयोग होने वाली तकनीकी और आधुनिक मशीनों से रूबरू हो सकेगा।यह कमलनाथ सरकार के गरीबों किसानों के सरोकारों में शामिल होने का परिचायक है।वे केवल चिंता ही नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके वेहतर भविष्य के लिये बेहतर तकनीकी और कौशल भी उनके दरवाजे तक ला रहे हैं।

(लेखक स्वतंत्र विश्लेषक एवं कांग्रेस विचार विभाग के अध्यक्ष हैं)